मैं तो नहीं हूँ इंसानों में
बिकता हूँ मैं तो इन दुकानों में
दुनिया बनाई मैंने हाथों से
मिट्टी से नहीं, जज़्बातों से
फिर रहा हूँ ढूँढता
मेरे निशाँ है कहाँ?
मेरे निशाँ है कहाँ?
तेरा ही साया बनके तेरे साथ चला मैं
जब धूप आई तेरे सर पे तो छाँव बना मैं
तेरा ही साया बनके तेरे साथ चला मैं
जब धूप आई तेरे सर पे तो छाँव बना मैं
राहों में तेरी रहा मैं हमसफ़र की तरह
उलझा है फिर भी तू जालों में
ढूँढे सवालों को जवाबों में
खोया हुआ है तू कहाँ? (तू कहाँ)
मुझसे बने हैं ये पंछी, ये बहता पानी
लेके ज़मीं से आसमाँ तक मेरी ही कहानी
मुझसे बने हैं ये पंछी, ये बहता पानी
लेके ज़मीं से आसमाँ तक मेरी ही कहानी
तू भी है मुझसे बना, बाँटे मुझे क्यूँ यहाँ?
मेरी बनाई तक़दीरें हैं (तक़दीरें हैं)
साँसों भरी ये तस्वीरें है
फिर भी हैं क्यूँ बेज़ुबाँ? (बेज़ुबाँ) मेरे निशाँ… — Lyrics by Kumaar
These lines from a song played in a Bollywood movie called OMG just makes one sit and take notice. Imagine if the God that we believe in were to roam the streets singing these lines. What would we tell him? That we are ashamed? That the solution is with him, not us? That we pray harder to him?
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